अनुवांशिकता एवं वातावरण का महत्व | For CTET, B.Ed & D.El.Ed

अनुवांशिकता एवं वातावरण का महत्व अनुवांशिकता एवं वातावरण परस्पर एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं। अनुवांशिकता एवं वातावरण एक दूसरे से इस प्रकार से जुड़े हुए होते हैं कि इन्हें पृथक नहीं किया जा सकता। यह दोनों बाल विकास को गहरे स्तर पर प्रभावित करते हैं। चलिए जानते हैं कि अनुवांशिकता एवं वातावरण का महत्व क्या है?

अनुवांशिकता क्या है?

अनुवांशिकता को वंशानुक्रम(Heredity) तथा अनुवांशिक को वंशानुगत भी कहा जाता है। अनुवांशिक या वंशानुगत गुणों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरण को अनुवांशिकता करते है अर्थात माता-पिता का गुण बालकों में पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होती रहती है। यह प्रक्रिया अनुवांशिकता कहलाता है। अनुवांशिकता के माध्यम से शारीरिक, मानसिक, सामाजिक गुणों का स्थानांतरण बालकों में होता है।

वातावरण क्या है?

हमारे आस-पड़ोस की वे सारी वस्तुएं जिनसे हम गिरे हुए होते हैं पर्यावरण या वातावरण कहलाता है

अनुवांशिकता एवं वातावरण का महत्व

  • बालक के संपूर्ण व्यवहार की सृष्टि अनुवांशिकता और वातावरण के अंतः क्रिया द्वारा होती है।
  • बालक के संपूर्ण व्यवहार की सृष्टि अनुवांशिकता और वातावरण की अंतर क्रिया द्वारा होती है।
  • शिक्षा की किसी भी योजना में वातावरण और अनुवांशिकता को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है।
  • शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक, सामाजिक, सभी प्रकार के विकास पर अनुवांशिकता एवं वातावरण दोनों का प्रभाव पड़ता है जिसके कारण बालक की विकास एवं शिक्षा दोनों प्रभावित होती हैं।
  • वंशानुक्रम से व्यक्ति शरीर का आकार प्रकार प्राप्त करता है। जबकि वातावरण शरीर को पुष्ट करता है।
  • बौद्धिक क्षमता के लिए सामान्यतः अनुवांशिकता या वंशानुक्रम ही जिम्मेदार होता है।
  • बालक की रुचियां, प्रवृत्तियां तथा अभिवृत्ति आदि के विकास के लिए वातावरण अधिक जिम्मेदार होता है।
  • बाल अपराध जैसे चोरी करना, झूठ बोलना, अपराध में लिप्त रहना इत्यादि अवगुण के विकास में बालक के परिवार एवं उसके वंशानुक्रम की अहम भूमिका होती है।
  • अनुवांशिकता एवं वातावरण बालक के विकास पर पड़ने वाले प्रभाव के ज्ञान के अनुरूप शिक्षक विद्यालय के वातावरण को बच्चों के लिए उपयुक्त बनाता है, जिससे छात्रों के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन किया जा सके एवं शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सके।
  • बालक के बहुमुखी विकास में वंशानुक्रम तथा वातावरण दोनों का योगदान होता है।
  • बालक के विकास में वंशानुक्रम और वातावरण दोनों का योगदान मिलता है तो बालक के विकास को सार्थक दिशा मिल जाती है।
  • अनुवांशिकता एवं वातावरण दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं।

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