आगमन विधि तथा निगमन विधि में अंतर


आगमन विधि तथा निगमन विधि में अंतर जानने के लिए सबसे पहले हम लोगों को यह जानना होगा कि आगमन विधि क्या है? तथा निगमन विधि क्या है? इन दोनों इन दोनों विधि के गुण क्या है? और दोष क्या है ? तत्पश्चात हमलोग आगमन विधि तथा निगमन विधि में अंतर स्पष्ट रूप से पा सकते हैं तो चलिए हम एक-एक विधि करके देखते हैं कि आगमन विधि क्या है तथा निगमन विधि क्या है?

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आगमन विधि का अर्थ :-

आगमन विधि, उस विधि को को कहते है, जिसमें विशेष तथ्य एवं घटनाओं के लक्षण एवं विश्लेषण द्वारा सामान्य नियम व सिद्धांतों का निर्माण किया जाता है। आगमन विधि ज्ञात से अज्ञात की ओर, विशिष्ट से सामान्य की ओर एवं मूर्त से अमूर्त की ओर शिक्षण सूत्रों का प्रयोग किया जाता हैका प्रयोग किया जाता है।

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दूसरे शब्दों में,

इस विधि का प्रयोग करते समय शिक्षक बालकों के सामने उन्हीं के अनुभव क्षेत्र से विभिन्न उदाहरणों को प्रस्तुत करता है। तत्पश्चात के द्वारा पेश किए हुए विशिष्ट उदाहरणों के संबंध में निरीक्षण, परीक्षण एवं ध्यानपूर्वक सोच विचार करा कर सामान्य नियम व सिद्धांत निकलवा आता है। इस तरह आगमन विधि में विशिष्ट उदाहरण द्वारा बालकों को सामान्यीकरण या सामान्य नियमों को निकलवाने हेतु प्रोत्साहित किया जाता है। उदाहरण के लिए, व्याकरण
पढ़ाते समय बालकों के द्वारा यह सामान्य ज्ञान निकलवाया जा सकता है कि किसी व्यक्ति, वस्तु , स्थान तथा गुण को संज्ञा कहते हैं।

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आगमन विधि तथा निगमन विधि में अंतर



आगमन विधि के गुण :-

1. आगमन विधि में ज्ञात से अज्ञात की ओर, सरल से जटिल और की ओर चलकर मूर्त उदाहरणों द्वारा बालको से समाने नियम निकलवाने जाते हैं। इससे बालक सक्रिय एवं प्रसन्न रहते हैं तथा ज्ञानार्जन के लिए उनकी रुचि लगातार बनी रहती है।

2. इस विधि में बालक उदाहरणों का विश्लेषण करते हुए सामान्य नियम समय निकाल लेते हैं।

3. आगमन विधि द्वारा ज्ञान प्राप्त करते हुए बालक को सीखने के हरा स्तर को पार करना पड़ता है इससे शिक्षा प्रभावशाली बन जाता है।

4. इस विधि द्वारा प्राप्त किया हुआ ज्ञान संग बालकों का खोजा हुआ ज्ञान होता है ऐसा ज्ञान उनके मस्तिष्क का स्थाई अंग बन जाता है

5. आगमन विधि द्वारा बालकों को नवीन ज्ञान के खोजने का प्रशिक्षण मिलता है।

6. यह भी ठीक है भारी कि जीवन हेतु बहुत लाभप्रद है अतरिया विधि एक प्राकृतिक विधि है।

आगमन विधि तथा निगमन विधि में अंतर


निगमन विधि का अर्थ :-

निगमन विधि शिक्षण की निगमन विधि उसी को कहते हैं जिसमें सामान्य से विशिष्ट की ओर बढ़ा जाता है। इस तरह हम कर सकते हैं निगमन विधि आगमन विधि के बिल्कुल विपरीत है। निगमन विधि का प्रयोग करते समय शिक्षक बालकों के सामने पहले किसी सामान्य नियम  को रखते हैं, तत्पश्चात उस नियम की सत्यता को प्रमाणित करने हेतु विभिन्न उदाहरणों का प्रयोग करते हैं। कहने का अभिप्राय है कि निगमन विधि में विभिन्न प्रयोग एवं उदाहरणों के माध्यम से किसी सामान्य नियम की सत्यता को सिद्ध कराया जाता है।
उदाहरण के लिए- विज्ञान की शिक्षा देते समय बालक से किसी भी सामान्य नियम को कई प्रयोगों द्वारा सिद्ध कराया जा सकता है। जिस तरह इस विधि का प्रयोग विज्ञान के शिक्षण में किया जा सकता है इसी तरह का प्रयोग व्याकरण, अंकगणित एवं ज्यामिति आदि अन्य विषयों के शिक्षण में भी सफलतापूर्वक किया जा सकता है।


निगमन विधि के गुण :-

(1.)छोटे बालको के लिए बहुत लाभदायक है। इसके प्रयोग द्वारा बालक ज्ञान का प्रयोग करना सफलतापूर्वक सीख जाते हैं।
(2.) यह विधि सभी विषय को पढ़ाने हेतु उपयुक्त है।
(3.)निगमन विधि द्वारा कक्षा के सभी बालकों को एक ही समय में पढ़ाया जा सकता है।
(4. )निगमन विधि द्वारा नियमों की जानकारी प्राप्त करते हैं उन्हें अशुद्ध नियमों को जानने का कोई अवसर नहीं मिलता।
(5.) किस विधि के प्रयोग से समय एवं शक्ति दोनों की बचत होती है।
(6.) निगमन विधि में शिक्षक बने बनाए नियमों को बालकों के सामने प्रस्तुत करता है। इस तरह निगमन विधि शिक्षक का कार्य बहुत सरल करता है।

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