कोहलबर्ग के नैतिक विकास का सिद्धांत For CTET,D.El.Ed & B.ed

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कोहलबर्ग के नैतिक विकास का सिद्धांत

CTET, D.El.Ed & B.ed के लिए कोहलबर्ग (kohalbarg) के नैतिक विकास का सिद्धांत एक बहुत ही महत्वपूर्ण Topic है आज हमलोग कोहलबर्ग के नैतिक विकास का सिद्धांत के बारे में विस्तृत रूप से अध्ययन करेंगे कोहलबर्ग ने नैतिक विकास का सिद्धांत दिया था इसीलिए कोहलबर्ग(kohalbarg) के सिद्धांत को उन्हीं के नाम कोहलबर्ग के नैतिक विकास का सिद्धांत के नाम से जाना जाता है

कोहलबर्ग का परिचय

कोहलबर्ग का पूरा नाम लॉरेंस कोहलबर्ग है कोहलबर्ग (1927-1987) एक अमेरिकन मनोवैज्ञानिक कोहलबर्ग थे जीन पियाजे के नैतिक मुद्दों के सिद्धांत से प्रभावित होकर उन्होंने “नैतिक न्याय” को अपने अध्ययन के रूप में चुना कोहलबर्ग ने अपने प्रयोग के लिए 10 से 16 वर्ष के बीच आने वाले बालक को चुना तथा बालकों के साक्षात्कार से प्राप्त तथ्यों को विश्लेषण करके जीन पियाजे के सिद्धांत को विस्तारित, परिवर्तित तथा परिष्कृत रूप प्रदान किया

कोहलबर्ग ने अपने प्रयोग के फलस्वरुप पाया की बालक का विकास कुछ निश्चित अवस्थाओं में होता है, जो अवस्थाएं सार्वभौमिक होती है

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कोहलबर्ग(kohalbarg) अपने प्रयोगों में बालकों के सामने भिन्न भिन्न प्रकार के लघु कथा को उपस्थित करके उससे संबंधित प्रश्न पूछते थे लघु कथा में से एक लघु कथा निम्न है-

यूरोप में एक महिला मौत के कगार पर थी। डाक्टरों ने कहा कि एक दवाई है जिससे शायद उसकी जान बच जाए। वो एक तरह का रेडियम था जिसकी खोज उस शहर के एक फार्मासिस्ट ने उस दौरान ही की थी। दवाई बनाने का खर्चा बहुत था और दवाई वाला दवाई बनाने के खर्च से दस गुना ज्यादा पैसे मांग रहा था। उस औरत का इलाज करने के लिए उसका पति हाइनज उन सबके पास गया जिन्हें वह जानता था। फिर भी उसे केवल कुछ पैसे ही उधार मिले जो कि दवाई के दाम से आधे ही थे। उसने दवाई वाले से कहा कि उसकी पत्नी मरने वाली है, वो उस दवाई को सस्ते में दे दे। वह उसके बाकी पैसे बाद में देगा। फिर भी दवाई वाले ने मना कर दिया। दवाई वाले ने कहा कि मैंने यह दवाई खोजी है, मैं इसे बेच कर पैसा कमाऊंगा। तब हाइनज ने मजबूर होकर उसकी दुकान तोड़ कर वो दवाई अपनी पत्नी के लिए चुरा ली।

लघुकथा के आधार पर कोहलबर्ग(kohalbarg) दो बातों पर विशेष रूप से बल दिया है

1. नैतिक दुविधा

नैतिक दुविधा एक प्रकार से ऐसी दुविधा है जिसमें किसी व्यक्ति के सामने दो या दो से अधिक कार्य उपलब्ध होते हैं और सभी कार्य जरूरी तथा नैतिक होता है, परंतु इस व्यक्ति को इन सभी कार्यों में से सिर्फ एक कार्य को चुनना होता है

2. नैतिक तर्कणा

यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें सही या गलत प्रश्नों के बारे में निर्णय लिया जाता है अर्थात सही या गलत के प्रश्न के बारे में निर्णय लेने में शामिल चिंतन की प्रक्रिया को नैतिक तर्कणा कहा जाता है

उपरोक्त लघुकथा के आधार पर कोहलबर्ग ने बताया कि व्यक्ति में नैतिक विकास की दो स्तर से होकर गुजरता है तथा प्रत्येक अवस्था की दो – दो अवस्थाएं होती है तथा अवस्था का क्रम निश्चित होती है

1.पूर्व परंपरागत अवस्था या पूर्व नैतिक स्तर (7 से 10 वर्ष तक)

इस अवस्था में बालक अपनी आवश्यकताओं के संबंध में सोचता है बालक को जो अच्छा लगता है वही सोचता है वही करता है नैतिक दुविधा से संबंधित प्रश्न बालकों के लाभ या हानि पर आधारित होते हैं इस अवस्था के अंतर्गत दो चरण आते हैं-

(a) दंड तथा आज्ञापालन अभिमुखता

इस अवस्था में बालकों के आज्ञापालन का भाव दंड पर आधारित होता है बालक स्वंय को परेशानियों से बचाना चाहता है कोहलबर्ग का मानना है कि यदि कोई बालक स्वीकृत व्यवहार को अपनाता है तो इसका कारण वह बालक दंड से अपने आप को बचाता है अर्थात वह डर के कारण ऐसा कर रहा है

(b) आत्म अभिरुचि तथा प्रतिफल अभिमुखता

इस अवस्था में बालकों का व्यवहार खुलकर सामने नहीं आता है इस अवस्था में बालक किसी लोभ के कारण कार्य को करना चाहता है जैसे- पुरस्कार पाने के लिए नियमों का पालन करता है

2. परंपरागत नैतिक अवस्था ( 10 से 13 वर्ष तक)

यह अवस्था कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत का दूसरी अवस्था है यह अवस्था 10 से 14 वर्ष के बीच की अवस्था होती है इस अवस्था में बालक सही गलत का पहचान करने लगता है इस अवस्था में बालक समझने लगता है कि वे समस्त क्रियाएं सही है जिनमें दूसरों की मदद होती है
इस अवस्था के अंतर्गत दो अवस्था में आती है-

(a) अधिकार संरक्षण अभिमुखता

इस अवस्था में बच्चे नियम अथवा व्यवस्था के प्रति जागरूक होते हैं तथा नियमों का पालन करने के प्रति जवाबदेह होते हैं

(b) अच्छा लड़का या अच्छी लड़की

इस अवस्था में बालकों में एक दूसरे का सम्मान करने तथा सम्मान पाने की इच्छा पाई जाती है

3. उत्तर परम्परागत नैतिक अवस्था (13 वर्षों से ऊपर )

कोहलबर्ग(kohalbarg) के अनुसार इस अवस्था में बालकों में नैतिक मूल्यों तथा चारित्रिक मूल्यों का पूर्णरूपेण विकास हो जाता है बालक बाहरी सामाजिक आशाओं को पूरा करने में रुचि रखता है बालक अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र के महत्व को प्राथमिकता देते हुए एक नियमबद्ध व्यवस्था के अंतर्गत कार्य करता है
इस अवस्था के अंतर्गत दो चरण आते हैं-

(a) सामाजिक अनुबंध अभिमुखता

इस अवस्था में बालक वही करते हैं जो उन्हें सही लगता है तथा इस बात का भी क्या लगते हैं कि जो नियम चला आ रहा है उसमें सुधार की आवश्यकता तो नहीं है

(b) सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत अभिमुखता

इस अवस्था में अंतःकरण(conscience ) की ओर अग्रसर हो जाती है अब बच्चे का आचरण दूसरे के प्रतिक्रियाओं का विचार किए बिना उसके आंतरिक आदर्शों के द्वारा होता है यहां बच्चे के अनुरूप व्यवहार करना है

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