समाज क्या है? समाज का अर्थ, समाज की परिभाषा एवं समाज की विशेषता B.Ed & D.El.Edआज के इस लेख में आप समाज के बारे में अध्ययन करेंगे। इस लेख के माध्यम से आप जानेंगे कि- समाज क्या है? समाज का अर्थ क्या है? समाज की परिभाषा क्या है एवं समाज की विशेषता है कौन-कौन सी है? 

समाज का अर्थ (Meaning of society)

समाजशास्त्र एक विज्ञान है और समाज शब्द का एक अपना विशिष्ट अर्थ है जिसका संबंध समाजशास्त्र के शब्दावली से हैं।

समाज शब्द का प्रयोग सामाजिक संबंधों में ताने-बाने के लिए किया जाता है। सामाजिक संबंध कम से कम दो व्यक्तियों के बीच स्थापित होते हैं तथा इसके साथ यह भी अनिवार्य है कि वह व्यक्ति एक दूसरे के अस्तित्व के प्रति जागरूक हो तथा परस्पर अंतर क्रिया भी कर रहे हो।

यदि कोई स्थान पर दो या दो से अधिक व्यक्ति रहते हो और भी आपस में कोई भी पारस्परिक क्रिया नहीं करते हो और कोई भी एक दूसरे को प्रभावित नहीं करते हो तो इस स्थिति में उन दो व्यक्तियों के समूह को समाज नहीं कहा जा सकता है।

समाज क्या है? समाज का अर्थ, समाज की परिभाषा एवं समाज की विशेषता 

व्यक्तियों की आपस में संबंध ही सामाजिक व्यवहार के जनक होते हैं इस प्रकार सामाजिक संबंधों की स्थापना के लिए तीन बातों का होना अनिवार्य है:-

पहला :- कम से कम दो व्यक्तियों का होना।
दूसरा :-  उनमें एक दूसरे के प्रति जागरूक होना।
तीसरा :- उनके द्वारा परस्पर कुछ ना कुछ आदान-प्रदान करना।

समाज के संदर्भ में मैकाइवर तथा पेज ने कहां है कि जहां कभी भी सहयोग के साथ संघर्ष की संभावना होती है वही समाज का अस्तित्व होता है

सामाजिक संबंधों के परिणाम स्वरुप विकसित जाल को ही समाज कहा जाता है।

समाज की परिभाषा (Definition of society)

मैकाइवर तथा पेज के अनुसार:- समाज नीतियों एवं कार्य प्रणाली प्रभुत्व एवं पारस्परिक सहयोग अनेक समूहों और उनके विभाग जनों की मानव व्यवहार के निमंत्रण हो एवं स्वाधीनता ओं की एक व्यवस्था है।

गिडिग्स के अनुसार :- समाज स्वयं एक संघ है यह एक संगठन तथा औपचारिक संबंधों का योग है जिसमें सहयोग देने वाले व्यक्ति एक दूसरे से संबंधित होते हैं।

समाज की विशेषताएं (Characteristics of society)

  • समाज मनुष्य तक ही सीमित नहीं है क्योंकि पशु और पक्षियों का भी एक समाज होता है इसलिए समाज और जीवन के परस्पर घनिष्ठ संबंध है।
  • समाज व्यक्तियों का एक समूह नहीं बल्कि व्यक्तियों में जो पारस्परिक संबंध पाए जाते हैं उन्हें की एक व्यवस्था है।
  • समाज व्यक्तियों में पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न करता है तथा इस पारस्परिक निर्भरता से ही समाज का निर्माण होता है।
  • समाज में निरंतर परिवर्तनशील ता रहती है क्योंकि समाज एवं उनके सदस्यों में व्याप्त संबंधों का व्यवस्था स्थिर ना होकर परिवर्तनशील होती है।
  • समाज का रूप मूर्त न होकर अमूर्त होता है यही सामाजिक संबंधों की एक व्यवस्था है। सामाजिक संबंध अमूर्त होते हैं क्योंकि उनको ना तो देखा जा सकता है और ना ही स्पर्श किया जा सकता है किंतु उन की अनुभूति मात्र की जा सकती है।

आज के इस लेख में आपने जाना कि- समाज क्या है?

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