आज के इस लेख में आप लोग श्री अरविंद घोष के शिक्षा दर्शन के बारे में अध्ययन करेंगे। इस लेख के माध्यम से आप जानेंगे कि श्री अरविंद घोष के शैक्षिक विचार क्या-क्या थे? श्री अरविंद घोष के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य क्या है? श्री अरविंद घोष के अनुसार शिक्षा का अर्थ क्या है? तो चलिए सबसे पहले हम लोग जानते हैं कि- श्री अरविंद घोष का शैक्षिक विचार क्या थे?

श्री अरविंद घोष के शिक्षा दर्शन | श्री अरविंद घोष के शैक्षिक विचार | श्री अरविंद घोष के अनुसार शिक्षा का अर्थ, उद्देश्य

श्री अरविंद घोष का शैक्षिक विचार

श्री अरविंद घोष एक महान दार्शनिक, एक महान शिक्षाशास्त्री थे। उनका जन्म 15 अगस्त 1875 ई में कोलकाता में हुआ था। श्री अरविंद घोष ने अपने शिक्षा संबंधी विचारों को साप्ताहिक कर्मयोगिन मैं प्रकट करते हुए बताया कि अंतःकरण मनुष्य का सर्वोत्तम उपकरण है। जिसके निम्नलिखित चार स्तर है-

1.भूत कालीन मानसिक संस्कार अथवा स्मृति कोष या चित

2. वास्तविक मानसिक अथवा मानस

3. बुद्धि

4. ज्ञान अथवा सत्य की स्वभाविक अनुभव की अंतर्दृष्टि की शक्ति

श्री अरविंद घोष के शिक्षा दर्शन

चित

श्री अरविंद घोष ने बताया कि चित का स्थान सर्वोपरि है और अन्य तीनों स्तर उसी पर आधारित है। उन्होंने बताया कि चित ही भूतकालीन अनुभवों तथा संस्कारों का कोष है। उनके अनुसार चित का प्रशिक्षण नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह अपने उद्देश्य की पूर्ति स्वयं करता है। इतने पर भी सक्रिय स्मृति आवश्यक बातों का चुनाव करती है जो उपयुक्त भी हो सकता है और अनुपयुक्त भी हो सकता है। ऐसी हालात में केवल सक्रिय स्मृति से ही प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

मानस

भारतीय मनोविज्ञान के अनुसार मानस मनुष्य की छठवीं ज्ञानेंद्रियां हैं। इसी ज्ञानेंद्रिय के द्वारा चिंतन, मनन तथा कल्पना की जाती है। इसका कारण अन्य ज्ञानेंद्रियों से सूचना प्राप्त करके उनके विचारों में परिवर्तन करना है।

बुद्धि

अरविंद घोष के अनुसार बुद्धि विचारों का वास्तविक यंत्र हैं। इसमें विश्लेषणात्मक, आलोचनात्मक तथा रचनात्मक गुण मौजूद होता है। यह सभी शक्तियां तार्किक बुद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक है।

ज्ञान

श्री अरविंद घोष के अनुसार ज्ञान अंतःकरण का चौथा प्रमुख स्तर है। यह वह शक्ति है जिसे हम दिव्यदृष्टि या अंतर्दृष्टि कह सकते हैं। एक स्वस्थ्य शिक्षक को बालक के इस शक्ति को प्रोत्साहित करना चाहिए, जिससे अंतर्ज्ञान की प्रवृत्ति का विकास हो सके।

श्री अरविंद घोष के अनुसार शिक्षा का अर्थ

अरविंद घोष के अनुसार वास्तविक शिक्षा का उद्देश्य है- चेतना का विकास करना, उसका संस्कार तथा रूपांतरण करना।

श्री अरविंद घोष कहते हैं कि सच्ची और वास्तविक शिक्षा केवल वही है जो मानव की अंतर्निहित शक्तियों को इस प्रकार से विकसित करती है कि वह उन से पूर्णतया लाभान्वित होता है।

श्री अरविंद घोष ने लिखा है कि –सच्ची शिक्षा को मशीन से बना हुआ सूरत नहीं होना चाहिए अपितु इसको मानव के मस्तिष्क तथा आत्मा की शक्तियों का निर्माण अथवा जीवित उत्कर्ष करना चाहिए।

श्री अरविंद घोष के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य

श्री अरविंद घोष ने अपनी शिक्षा दर्शन में शिक्षा के अनेकों उद्देश्य को बताया है नीचे हमने उनके अनुसार कुछ प्रमुख उद्देश्य को बताने जा रहा हूं।

  • शारीरिक विकास और शुद्धि भी शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।
  • ज्ञानेंद्रियों का प्रशिक्षण देना भी शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है।
  • मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण कराना।
  • तार्किक शक्तियों का प्रशिक्षण देना।
  • नैतिकता का विकास कराना।
  • अध्यात्मिक विकास कराना

उपरोक्त सारी बातें श्री अरविंद घोष के द्वारा बताए गए शिक्षा के उद्देश्य के अंतर्गत आते हैं।

इसलिए के माध्यम से आपने श्री अरविंद घोष के शिक्षा दर्शन को जाना। इस लेख में अपने जाना कि श्री अरविंद घोष के अनुसार शिक्षा का अर्थ क्या है? श्री अरविंद घोष के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य क्या है?

मैं उम्मीद करता हूं कि यह लेख आपको पसंद आई होगी तथा यह आपके लिए उपयोगी भी होगा। इसी तरह के अन्य लेख को पढ़ने के लिए पढ़ते रहिए…..RKRSTUDY.NET

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