वृद्धि किसे कहते हैं?

वृद्धि किसे कहते हैं

वृद्धि का अर्थ बालकों की शारीरिक संरचना का विकास से है। जिसके अंतर्गत लंबाई, भार, मोटाई, तथा अन्य अंगों का विकास होता है। वृद्धि की प्रक्रिया आंतरिक तथा बाह्य दोनों रूप में होती है। यह एक निश्चित उम्र तक होती है तथा भौतिक पहलू (Physical Aspect) में ही संभव है।

  •  बालकों के विकास में वृद्धि शब्द का प्रयोग परिमाणात्मक परिवर्तन जैसे- बच्चे के बड़े होने के साथ-साथ उसके आकार, लंबाई इत्यादि के लिए होता है।
  • वृद्धि विकास के प्रक्रिया का एक चरण होता है तथा इसका क्षेत्र सीमित होता है।
  • यह प्रक्रिया एक निश्चित उम्र तक ही चलती है तथा जब बालक परिपक्व हो जाते हैं तब यह प्रक्रिया रुक जाती है।
  •  यह (वृद्धि) भौतिक विकास को दर्शाता है।
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वृद्धि किसे कहते हैं

वृद्धि की अवस्थाएं निम्नलिखित है :-

शैशवावस्था

  • शैशवावस्था जन्म से 2 वर्ष तक की अवस्था होती है।
  • इस अवस्था में बच्चों का शारीरिक व मानसिक तेजी से होता है।
  • बालक किस अवस्था में पूर्ण रूप से अपने माता-पिता पर आश्रित होते हैं।
  • इस अवस्था में संवेगात्मक विकास तेजी से होता है तथा सीखने की क्षमता का विकास तेजी से होता है।

बाल्यावस्था

शैशवावस्था के बाद की अवस्था बाल्यावस्था कहलाती है।

बाल्यावस्था को दो भागों में बांटा गया है –

1. पूर्व बाल्यावस्था

  • यह अवस्था 2 से 6 वर्ष के बीच की अवस्था होती है।
  • इस अवस्था में बालकों का बाहरी जुड़ाव होने लगता है।
  • इस अवस्था में बालकों में अनुकरण एवं दोहराने की प्रवृत्ति का विकास होने लगता है।
  • पूर्व बाल्यावस्था में बालकों के जिज्ञासा तथा सामाजिकरण दोनों में तेजी से वृद्धि होने लगता है।
  • मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह अवस्था भाषा सीखने का सर्वोत्तम अवस्था होता है।

2.उत्तर बाल्यावस्था

  • यह अवस्था 6 से 12 वर्ष के बीच की अवस्था होती है।
  • इस अवस्था में बच्चों में बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक इत्यादि का व्यापक रूप से विकास होता है।
  • इस अवस्था में स्मरण क्षमता में भी वृद्धि होती है।
  • उत्तर बाल्यावस्था में बच्चों में समूह भावना का विकास होता है अर्थात बालक समूह में खेलना, समूह में रहना, समलैंगिक व्यक्तियों को मित्र बनाना इत्यादि पसंद करता है।
  • उत्तर बाल्यावस्था में आने पर बालकों को जीवन में अनुशासन तथा नियमों की महत्ता समझ में आने लगती है।

वृद्धि किसे कहते हैं

किशोरावस्था

  • यह अवस्था 12 से 18 वर्ष के बीच की अवस्था है।
  • इस अवस्था में व्यक्ति के शरीर में काफी बदलाव देखने को मिलता है।
  • यह वह समय होता है, जितने बालक बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर उन्मुख होता है।
  • किशोरावस्था में किशोरों की लंबाई तथा भार दोनों में वृद्धि होती है साथ ही साथ मांसपेशियों का भी विकास होता है।
  • 12 से 14 की आयु के बीच लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की लंबाई व मांसपेशियों में तेजी से वृद्धि होती है तथा 14 से 18 वर्ष की आयु के बीच लड़कियों की अपेक्षा लड़कों की लंबाई में मांसपेशियां तेजी से बढ़ती है।
  • इस अवस्था में किशोरों में ” मैं कौन हूं”, “मैं क्या हूं” “मैं भी कुछ हूं” जैसी भावनाओं का विकास होने लगता है।
  • किशोरावस्था में किशोर की बुद्धि का पूर्ण विकास को जाता है।
  • इस अवस्था में मित्र बनाने की प्रवृत्ति तीव्र होती है एवं सामाजिक संबंधों में वृद्धि होती है।
  • यह अवस्था बालकों को नशा या अपराध की ओर उन्मुख होने की अधिक संभावना रहती है।
  • इस अवस्था में शिक्षको, अभिभावकों एवं मित्रों के सही मार्गदर्शन एवं सलाह की आवश्यकता पड़ती है।

युवा प्रौढ़ावस्था

  • यह अवस्था सामान्यतया 18 से 40 वर्ष तक की अवस्था होती है।
  • युवा प्रौढ़ावस्था का कोई निश्चित उम्र नहीं होती, यह अवस्था मानव विकास में एक निश्चित परिपक्वता ग्रहण करने से प्राप्त होती है।

परिपक्व प्रौढ़ावस्था

  • यह अवस्था सामान्यतया 40 से 65 वर्ष के बीच की अवस्था है।
  • इस अवस्था में शारीरिक विकास में गिरावट आने लगती है, अर्थात बालों का सफेद होना, मांस पेशियों में ढीलापन तथा चेहरे पर झुर्रियां आने लगता है।

वृद्ध प्रौढ़ावस्था

  • यह अवस्था 65 से ऊपर की अवस्था है।
  • इस अवस्था में शारीरिक क्षमता खत्म होने लगती है।
  • इस अवस्था में सामाजिक, आध्यात्मिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक क्रियाकलापों के प्रति रुझान आने लगती है।

वृद्धि को प्रभावित करने वाले कारक

वृद्धि को प्रभावित करने वाले अनेक कारक उत्तरदाई होते हैं जो निम्नलिखित है :-

1. पोषण

  • यह विधि तथा विकास का महत्वपूर्ण घटक होता है बालक को विकास के लिए उचित मात्रा में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण इत्यादि की आवश्यकता होती है।
  • हमारे खान-पान में उपयुक्त पोषक तत्व का कमी होगी तो वृद्धि एवं विकास प्रभावित होगा।

2. वंशानुगत

  • बालकों के शारीरिक एवं मानसिक विकास एवं वृद्धि में वंशानुगत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • माता-पिता के गुण एवं अवगुण का प्रभाव बच्चों पर स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है।

3. लिंग

  • लड़के और लड़कियों में विकास के क्रम में विविधता देखी जाती है।
  • किसी अवस्था में विकास की गति लड़कियों में तीव्र होती है तो किसी अवस्था में लड़कों में अधिक तेजी से विकास होता है।

4. वायु एवं प्रकाश

  • शरीर को स्वस्थ रखने के लिए स्वच्छ वायु की आवश्यकता होती है अगर वायु स्वच्छ ना मिला तो बालक बीमार हो सकता है तथा कार्य करने की क्षमता भी प्रभावित होती है।
  • शारीरिक विकास के लिए सूर्य के प्रकाश की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि सूर्य के प्रकाश से विटामिन-डी की पढ़ाती होती है। जो बालकों के वृद्धि तथा विकास में सहायक होता है।

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